रंगों में सजी सिनेमा की विरासत: बॉलीवुड के हाथ से बने पोस्टरों को नई पहचान दे रहे हैं चित्रकार कफील

नई दिल्ली: एक दौर था जब किसी फिल्म की रिलीज से पहले शहरों की दीवारों, सिनेमाघरों और प्रमुख चौराहों पर विशाल हाथ से बने पोस्टर दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते थे। इन पोस्टरों की चमक, रंगों की गहराई और कलाकारों की रचनात्मकता भारतीय सिनेमा की पहचान हुआ करती थी। हालांकि डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ यह कला धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी, लेकिन कुछ कलाकार आज भी इस विरासत को जीवित रखने में जुटे हैं। इन्हीं में से एक हैं चित्रकार कफील, जो बॉलीवुड के हाथ से बनाए जाने वाले पोस्टरों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

कफील वर्षों से पारंपरिक शैली में फिल्मी पोस्टर तैयार कर रहे हैं। उनके अनुसार, हाथ से बनाए गए पोस्टर केवल प्रचार सामग्री नहीं थे, बल्कि वे भारतीय कला और सिनेमा संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। हर पोस्टर में कलाकार की कल्पनाशीलता, मेहनत और भावनाएं दिखाई देती थीं, जो दर्शकों को फिल्मों से जोड़ने का काम करती थीं।

डिजिटल प्रिंटिंग और कंप्यूटर ग्राफिक्स के युग में जहां अधिकांश फिल्मी प्रचार सामग्री तकनीक के माध्यम से तैयार की जाती है, वहीं कफील आज भी ब्रश और रंगों के जरिए बड़े कैनवास पर फिल्मी किरदारों को जीवंत रूप देते हैं। उनके बनाए पोस्टरों में पुराने दौर की कलात्मक शैली और आधुनिक समय की प्रस्तुति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

कफील की कलाकृतियां न केवल कला प्रेमियों को आकर्षित कर रही हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को भी इस विलुप्त होती कला के महत्व से परिचित करा रही हैं। विभिन्न प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आयोजनों में उनके कार्यों को सराहना मिल रही है। उनका मानना है कि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद पारंपरिक कला की अपनी अलग पहचान और मूल्य है, जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए।

आज जब अधिकांश फिल्मी पोस्टर डिजिटल स्क्रीन तक सीमित हो गए हैं, तब कफील जैसे कलाकार भारतीय सिनेमा की उस रंगीन विरासत को संजोने का कार्य कर रहे हैं, जिसने दशकों तक दर्शकों की कल्पनाओं को आकार दिया। उनकी यह कोशिश न केवल कला को जीवित रख रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास से भी जोड़ रही है।